mahabaleshwar: I miss



उन दिनों कंकड़ और फूल इकट्ठा करते थे हम
ज़ंग लगे झूलों पर होते थे बड़ी शान से सवार 
हमारी पींगें छूती थी आसमान...
क्रिकेट  खेलते थे
बिना थके, दिनभर

लंगूरों की किल्कारियाँ सुनने जाते थे
उस खंडहर से बगीचे में
और बतियाते, बड़ी देर तक...

शाम की आरती के बाद
रात के खाने का मज़ा ही कुछ और हुआ करता था...
लहसुन का छोंका लगाई हुई आलू की सब्ज़ी
खाए, तो उन्ही के हाथ की

...याद है?
इक रोज़ मेले में ट्रेन से गिरी थी मैं
और तुमने स्टील के ग्लासों का पूरा ढेर
एक ही गेंद मारकर गिराया था

और मुझे एक दिन
बबलगम के गुब्बारे फुलाना सिखाया था तुमने
आम के स्वाद का था
बबलगम का वह टुकड़ा

रातरानी और लोबान की महक
मुझे आज भी अच्छी लगती है
उसी जगह मैने जाना
....आसमान में इतने सारे भी तारे होते हैं

उन धुंधले पहाड़ो से है कोई रिश्ता
जिन में समाए है ऐसे अनगिनत किस्से
जिनको पिरो पिरो कर
हमने अपने बचपन के यादगार पल
इकट्ठा किए थे

रास्ते हमारे चाहे कौनसे भी हो
यह सुहावनी यादें रहेंगी
हमेशा हमारे पास....